मेहनत, लगन और प्राकृतिक खेती के प्रति विश्वास हो तो बंजर जैसी जमीन भी सोना उगल सकती है। इसका उत्कृष्ट उदाहरण टोंक जिले के दूनी क्षेत्र की दुर्गापुरा ढाणी निवासी ऊषा देवी कोली हैं। उन्होंने लगभग तीन दशक पहले अपनी जमीन पर आंवला और नींबू का बाग लगाकर अद्भुत सफलता प्राप्त की, जो आज अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।
वर्ष 1995 में, कृषि विभाग के मार्गदर्शन में, उन्होंने करीब 200 आंवला और 50 नींबू के पौधे लगाए। उन्होंने पूरी तरह से प्राकृतिक खेती अपनाई और गोबर खाद के साथ-साथ जैविक उपचार का प्रयोग किया। इस दौरान उन्होंने रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं किया और कीटों एवं रोगों से बचाव के लिए धतूरा और नीम की पत्तियों से तैयार प्राकृतिक मिश्रण का उपयोग किया। इस दृष्टिकोण से बाग के अधिकांश पेड़ वर्षों बाद भी स्वस्थ और फलदार बने हुए हैं।
लगातार मेहनत के तीन वर्षों के बाद, वर्ष 1998 में बाग से पहली बार करीब एक टन आंवला और नींबू का उत्पादन हुआ, जिससे लगभग 15 हजार रुपए का लाभ हुआ। इसके बाद उत्पादन और आय में लगातार वृद्धि होती रही। वर्ष 2020 तक बाग से सालाना डेढ़ से दो लाख रुपए की आमदनी होने लगी। वर्ष 2021 में उनके पति मूलचंद कोली के सेवानिवृत्त होने के बाद, ऊषा देवी ने बाग की जिम्मेदारी पूरी तरह संभाल ली। वर्ष 2026 तक, इस बाग से परिवार को प्रतिवर्ष दो से तीन लाख रुपए तक का मुनाफा प्राप्त हो रहा है। इस सफलता ने क्षेत्र के अन्य किसानों को भी बागवानी के प्रति उत्साहित किया है।
कृषि विभाग ने भी निरंतर सहयोग प्रदान किया। किसानों तक नवाचार और तकनीकी जानकारी समय पर पहुंचाई जाती है। विभाग के सहायक कृषि अधिकारी चेतन शर्मा ने बताया कि किसानों की समस्याओं का मौके पर समाधान किया जाता है। इस प्रकार, बागवानी को बढ़ावा मिलने से कई किसानों की आय में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिला है।
ऊषा देवी कोली की कहानी यह दर्शाती है कि प्राकृतिक और जैविक खेती के माध्यम से कम पानी वाली और बंजर जमीन भी फलदायी और आर्थिक रूप से लाभकारी बन सकती है। इस उदाहरण ने राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों के किसानों के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का काम किया है।
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